मैं नीम को ही चाशनी कहता रहा

फिर दोस्ती को ज़िंदगी कहता रहा

हर बात से था बे-ख़बर मासूम दिल
क्यूँ ज़िंदगी को ख़ुद-कुशी कहता रहा

संसार से मुझ को मिली जो आजतक
हर बद-दुआ को बंदगी कहता रहा

साज़िश में दिल लगता था उस का और मैं
हर-पल ख़ुदा की सादगी कहता रहा

कोयल बड़ी चालाक निकली थी ‘अनुज’
हर राग को ही रागिनी कहता रहा

— sahllucknowi

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