मुझे वो जान से प्यारा है ज़िंदगी की तरह
उसे ख़्यालों में रखता हूँ शायरी की तरह
तमाम 'उम्र समझता रहा जिन्हें अपना
गया जो वक़्त गए वो भी अजनबी की तरह
महक रहा है ज़माने का हर चमन जिनसे
वो बेटियाँ हैं इन्हें खिलने दो कली की तरह
उजाले नाचते फिरते हैं जिसके आने से
ये कौन आया है महफ़िल में रौशनी की तरह
वो मेरा चाँद अगर छत पे आ गया तो रज़ा
अँधेरी रात भी चमकेगी चाँदनी की तरह
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