ज़िंदगी को गुनगुना कर चल दिएमौत को अपना बना कर चल दिएउम्र भर की दोस्ती जाती रहीआप ये क्या गुल खिलाकर चल दिएअब यक़ीं उन की ज़बाँ का क्या करेंजो फ़क़त सपने दिखा कर चल दिएआज उन का दिल दुखा शायद बहुतबज़्म से आँसू बहा कर चल दिएबे-बसी में और क्या करते 'रज़ा'दर्द-ओ-ग़म अपना सुनाकर चल दिए— SALIM RAZA REWA