तकरार में अजीब सी होती है जुस्तजू
रहते हैं दूर जिस से वो उतना है रू-ब-रू
लहजे में सादगी है नज़ाकत है मेरे जो
हर वक़्त एहतिराम से करता हूँ गुफ़्तगू
शर्तें लगा लगा के मोहब्बत को हार जा
फिर जीतने की तुझ को रहेगी न आरज़ू
छोटी सी बात पे कभी ज़ाया' करो न अश्क
रक्खो ज़रा सी आँख में अश्कों की आबरू
ऐसे ढले है इश्क़ के पैकर में हम यहाँ
आँखों से एक दूजे के लगते हैं हू-ब-हू
चलता है उँगलियों के इशारे पे अब मिरे
बेहतर था वक़्त रहते किया वक़्त से रुजू
कैसे गँवा दूँ जान मैं इक शख़्स के लिए
ऐसी हसीं हयात तो मिलती है कू-ब-कू
हर वक़्त माँगता हूँ यही रब से मैं दुआ
तेरी नज़र में मैं रहूँ मेरी नज़र में तू
करनी हो गुफ़्तगू तो मुलाक़ात कर 'समर'
कुछ इश्क़ दूर दूर से होते नहीं शुरू















