बात ही बात में जो हद से गुज़र जाते हैं
मोतबर लोग भी नज़रों से उतर जाते हैं
पास वादों का जो रखते हैं बिखर जाते है
बेवजह लोग ही बातों से मुकर जाते हैं
असलियत सामने आई जो किसी अपने की
फिर किसी पर भी यक़ीं करने से डर जाते हैं
ठोकरें खा के तो कम-अक़्ल बिगड़ते हैं यहाँ
तजरबें कर के ख़िरदमन्द सुधर जाते हैं
जब हमारे सिवा चाहेगा किसी ग़ैर को वो
ऐ ख़ुदा हम तो यही सोच के मर जाते हैं
अब ख़याल आया है मुझ को ये मसाफ़त कर के
जिन को मंज़िल नहीं मिलती वो किधर जाते हैं
रायगाँ ही रही परवाज़ की कोशिश भी सना
भर के आग़ोश में सब पर को कतर जाते हैं
— Sana Hashmi















