लहू से अपने ही ज़ख़्मों को धोना पड़ता है

ख़ुद अपने दर्द को दिल में समोना पड़ता है

हमें किसी न किसी का तो होना पड़ता है
बक़ा की जंग में हर शय को खोना पड़ता है

कभी ख़ुशी से कभी मस्लिहत की ख़ातिर भी
किसी के हाथ का बनना खिलौना पड़ता है

चटख रही है ये दीवार ज़ब्त की अब तो
दरार भरते हुए ख़ूब रोना पड़ता है

सियाही आँसुओं की छप न जाए आरिज़ पर
कई दफ़ा हमें चेहरा भिगोना पड़ता है

लिपटने लगती हैं जब यादें जिस्म से उस की
तो तकिया भींच के बाहों में सोना पड़ता है

मज़ार बन चुका हो ख़्वाहिशों का जब ख़ुद में
हमें फिर ऐसे जनाज़ों को ढोना पड़ता है

मैं चाहती हूँ नई नस्ल दे दुआ मुझ को
उन्हीं के वास्ते कुछ अच्छा बोना पड़ता है

सना ये शे'र असरदार तब ही बनते हैं
हर एक हर्फ़ में जज़्बा पिरोना पड़ता है

— Sana Hashmi

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