shahar bhar ke aainon par KHaak daali jaayegi | शहर भर के आइनों पर ख़ाक डाली जाएगी

  - Sarfraz Danish

शहर भर के आइनों पर ख़ाक डाली जाएगी
आज फिर सच्चाई की सूरत छुपा ली जाएगी

उस की आँखों में लपकती आग है बेहद शदीद
सोचता हूँ ये क़यामत कैसे टाली जाएगी

मुश्तइ'ल कर देगा उस को इक ज़रा सा एहतिजाज
मुझ पे क्या गुज़री है इस पर ख़ाक डाली जाएगी

क़ैद का एहसास भी होगा न हम को दोस्तो
यूँँ हमारे पाँव में ज़ंजीर डाली जाएगी

ऐ मोहब्बत लफ़्ज़ बन कर इतनी संजीदा न हो
एक दिन तू भी किताबों से निकाली जाएगी

शर्म से ख़ुर्शीद अपना मुँह छुपा लेगा कहीं
रोज़-ए-रौशन में भी 'दानिश' रात ढा ली जाएगी

  - Sarfraz Danish

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