यूँँ भी हम उन के निशाने पे नहीं आते हैं
उन के तेवर जो ठिकाने पे नहीं आते हैं
सुन मेरे भाई अगर तर्क-ए-त'अल्लुक़ हो तो
राज़ से पर्दा उठाने पे नहीं आते हैं
गाँव में आप ही हो जाते हैं सुख दुख में शरीक
शहर में लोग बुलाने पे नहीं आते हैं
वक़्त अच्छा हो तो बस इतना ही हो सकता है
लोग औक़ात दिखाने पे नहीं आते हैं
— Saurabh Sharma 'sadaf'















