“सुन री सखी”

यूँ ख़याल रख सखी जैसे तेरा ऐनक हूँ मैं
यूँ खिंचा जाऊँ तेरी ओर जैसे चुम्बक हूँ मैं
बरसात होने के बा'द निकलते हैं कीट-पतंगे
पर तुझे जो पसंद आएगा वही मेंढ़क हूँ मैं
यार तू तो समझती ही नहीं है मेरी ख़ामोशी
कब से इशारों में कह रहा तेरा सेवक हूँ मैं
ऐ सखी क्यूँ डरती है इक़रार-ए-मोहब्बत से
यूँ माँग रब से जैसे तेरा पूरा-पूरा हक़ हूँ मैं
सावन की बरसातें बड़ी प्यारी होती हैं सखी
तेरी गीली ज़ुल्फ़ें भीगी-भीगी पलक हूँ मैं
देख सखी यूँ नादानी में मुझे खो मत देना
तेरा यार और इक पागल-सा बालक हूँ मैं

— Sahil Verma

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