लेट उठते हैं लेट सोते हैं

कुछ अदीबों में ऐब होते हैं

जिन को मौला अता सुख़न कर दे
उन फ़क़ीरों के ऐश होते हैं

सौ-सौ शहनाइयाँ बजें फिर भी
सिसकियाँ भर के लोग रोते हैं

दूर जाते हैं जब भी वो मुझ से
और मेरे क़रीब होते हैं

आए बरसात तो मिले राहत
ऐसे बादल तो रोज़ होते हैं

कौन ज़ंजीर पाँव की तोड़े
चैन से हम क़फ़स में सोते हैं

याद करते हैं गांव की गालियाँ
और ज़ार-ओ-क़तार रोते हैं

— Shadan Ahsan Marehrvi

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