zanjeer kat ke kya giri aadhe safar ke beech | ज़ंजीर कट के क्या गिरी आधे सफ़र के बीच

  - Shahid Zaki

ज़ंजीर कट के क्या गिरी आधे सफ़र के बीच
मैं सर पकड़ के बैठ गया रहगुज़र के बीच

उतरा लहद में ख़्वाहिशों के साथ आदमी
जैसे मुसाफ़िरों-भरी नाव भँवर के बीच

दुश्मन से क्या बचाएँगी ये झाड़ियाँ मुझे
बचते नहीं यहाँ तो पयम्बर शजर के बीच

जितना उड़ा मैं उतना उलझता चला गया
इक तार-ए-कम-नुमा था मिरे बाल-ओ-पर के बीच

देते हो दस्तकें यहाँ सर फोड़ते हो वाँ
कुछ फ़र्क़ तो रवा रखो दीवार-ओ-दर के बीच

घर से चला तो घर की उदासी सिसक उठी
मैं ने उसे भी रख लिया रख़्त-ए-सफ़र के बीच

थकने के हम नहीं थे मगर अब के यूँँ हुआ
देता रहा फ़रेब सितारा सफ़र के बीच

मेरा सभी के साथ रवय्या है एक सा
'शाहिद' मुझे तमीज़ नहीं ख़ैर ओ शर के बीच

  - Shahid Zaki

Insaan Shayari

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