ajeeb manzar hai baarishon ka makaan paani men bah raha hai | अजीब मंज़र है बारिशों का मकान पानी में बह रहा है

  - Shakeel Azmi

अजीब मंज़र है बारिशों का मकान पानी में बह रहा है
फ़लक ज़मीं की हुदूद में है निशान पानी में बह रहा है

तमाम फ़सलें उजड़ चुकी हैं न हल बचा है न बैल बाक़ी
किसान गिरवी रखा हुआ है लगान पानी में बह रहा है

अज़ाब उतरा तो पाँव सब के ज़मीं की सतहों से आ लगे हैं
हवा के घर में नहीं है कोई मचान पानी में बह रहा है

कोई किसी को नहीं बचाता सब अपनी ख़ातिर ही तैरते हैं
ये दिन क़यामत का दिन हो जैसे जहान पानी में बह रहा है

उदास आँखों के बादलों ने दिलों के गर्द-ओ-ग़ुबार धोए
यक़ीन पत्थर बना खड़ा है गुमान पानी में बह रहा

  - Shakeel Azmi

Ghar Shayari

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