वो पिघलती रात ही कुछ और थी
उस बदन की बात ही कुछ और थी
रात भर हम करवटें लेते रहे
इश्क़ की सौग़ात ही कुछ और थी
लड़ते थे दो जिस्म वो इक दूजे से
जीत क्या वो मात ही कुछ और थी
देखी है बारिश कई इन नज़रों ने
वो मगर बरसात ही कुछ और थी
ये बरहमन क्या ही 'साहिर' जानते
आशिक़ों की ज़ात ही कुछ और थी
— Sahir banarasi















