ज़िंदगी तुझ सेे ख़फ़ा हूँ
फिर भी तुझ को चाहता हूँ
मुश्किलें तो देख कर दे
मिट्टी का बस इक घड़ा हूँ
कितनी ग़ाफ़िल है ये दुनिया
साथ हूँ मैं पर जुदा हूँ
जाना है तो जाओ फिर तुम
मैं कहाँ अब रोकता हूँ
क्यूँ सभी की फ़िक्र होगी
मैं कोई क्या देवता हूँ
कितना झूठा है तू 'साहिर'
रोज़ ये मैं सोचता हूँ
— Sahir banarasi















