तुम्हें भी शहर के चौराहे पर सजा देंगे
तुम्हारे नाम का पत्थर कहीं लगा देंगे
कुछ और पास नहीं तो किसी को क्या देंगे
किसी ने आग लगा दी तो वो हवा देंगे
ये और बात कि वो उसकी क्या सज़ा देंगे
ज़माने वालों को हम आईना दिखा देंगे
बिछड़ते वक़्त किसी से ये जी में सोचा था
भुलाना चाहा तो सौ तरह से भुला देंगे
किताब-ए-ज़ीस्त के औराक़ जल नहीं सकते
ये माना मेज़ से तस्वीर तो हटा देंगे
कहाँ से आए हो लेकर ये ख़ाक-ख़ाक बदन
किसी ने पूछ लिया तो जवाब क्या देंगे
उसी के साए में पलती है न ये दर्द की बेल
उजाड़ 'उम्र की दीवार ही गिरा देंगे
जुदाईयों के हैं जंगल में ज़ात के राही
ये वहम दिल में कि हम फ़ासले मिटा देंगे
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