
मोहब्बत आपसे करने में अब घबरा रहे हैं हम
भला कैसे ये आख़िर दर्द को अपना रहे हैं हम
जिसे अब रात दिन ही देखते थे बाहों में अपनी
उसी से ख़ैर अब मिलने में क्यूँ शर्मा रहे हैं हम
— Shivam Raahi Badayuni
Other sher from the same pen
Voices in the same orbit
Poetry by feeling