वज़्न ट्रेनों का फ़क़त ज्यूँँ पटरियाँ ही जानती हैं
बाप की मजबूरियाँ बस बेटियाँ ही जानती हैं
इश्क़ कितना है ज़रूरी तुम नहीं समझे कभी भी
क़ीमती कितना है पानी मछलियाँ ही जानती हैं
ख़्वाहिशों का क़त्ल कर के है क़फ़स में क़ैद अब जो
बेबसी उस आदमी की बेड़ियाँ ही जानती हैं
काम करना है ज़रूरी धूप क्या है बारिशें क्या
भूख मज़दूरों की बस दो रोटियाँ ही जानती हैं
पक्की सड़कों की तरफ़ जो चल पड़ा है अब ज़माना
दर्द तन्हाई का बस पगडंडियाँ ही जानती हैं
मंदिरों में मस्ज़िदों में और गिरजाघर में जा कर
मैं ने क्या माँगा है मेरी अर्ज़ियाँ ही जानती हैं
वक़्त से पहले जवानी क्यूँ ढली है इनसे पूछो
ज़िन्दगी की मुश्किलें ये झुर्रियाँ ही जानती हैं
छोड़ दे कॉलेज तू अब पढ़ सिलेबस ज़िन्दगी का
कुछ नहीं है डिग्रियों में डिग्रियाँ ही जानती हैं















