ख़ुद की खोज
इक दिन मेरे दरवाज़े पर
मैं ने इक आवाज़ लगाई
मन बिस्तर पर बैठा था
ढाँचा चल कर बाहर आया
मैं ने पूछा मैं हूँ क्या
सुन्न पड़ी गर्दन डोली
दाऍं बाऍं बाऍं दाऍं
नईं का उत्तर देकर वो
थम गई मूरत जैसे
होकर मायूस लौटा मैं
निकला ख़ुद की खोज में
पीड़ाओं के गाँव में खोजा
ख़ुशियों के गलियारों में
जगमग करती दुनिया में
जंगल के अँधियारों में
चीख़ों में सन्नाटों में
मैं मुझ को नईं मिल पाया
मिलता कैसे मैं तो बस
देख रहा था दूर खड़े
जीवन का चलता फिरता
खेल तमाशा चुपके से
— Shivam Rathore















