बात वो भी तो कुछ रही होगी
इतनी जो दूर तक गई होगी
कभी देखे सुने नहीं उसके
वो बिना पाँव ही चली होगी
थी सुनी रात जिस की सुब्ह नहीं
रात फिर कैसे वो कटी होगी
ये जो सहरा दिखाई देता है
कभी बहती यहाँ नदी होगी
न गिला ही किया न रोया वो
चोट दिल पे ही फिर लगी होगी
वो अकेला ही रह गया देखो
बात उसने कही सही होगी
रात की बात भूलने की अदा
मयकदे से ‘शिवम्' मिली होगी
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