"बे-हया"

हमीं तो हैं वो
जो तय करेंगे
कि इन के जिस्मों पे किस का हक़ है
हमीं तो हैं वो
जो तय करेंगे
कि किस से इन के निकाह होंगे
ये किस के बिस्तर की ज़ीनतें हैं
वो कौन होगा जो अपने होंटों को
इन के जिस्मों की आब देगा
भले मोहब्बत किसी के कहने पे
आज तक हो सकी न होगी
मगर ये हम तय करेंगे
इन को किसे बसाना है अपने दिल में
हम इन के मालिक हैं
जब भी चाहें
इन्हें लिहाफ़ों में खींच लाएँ
और इन की रूहों में दाँत गाड़ें
ये माँ बनेंगी
तो हम बताएँगे
इन के जिस्मों ने कितने बच्चों को ढालना है
हमारे बच्चों के पेट भरने
अगर ये कोठे पे जा के अपना बदन भी बेचें
तो हम बताएँगे
किस को कितने में कितना बेचें
हमीं को हक़ है
कि इन के गाहक जो ख़ुद हमीं हैं से
सारी क़ीमत वसूल कर लें
हमीं को हक़ है कि इन की आँखें
हसीन चेहरे शफ़्फ़ाफ़ पाँव
सफ़ेद रानें दराज़ ज़ुल्फ़ें
और आतिशीं-लब दिखा दिखा कर
क्रीम साबुन सफ़ेद कपड़े और आम बेचें
दुकाँ चलाएँ नफ़अ' कमाएँ
हमीं तो हैं जो ये तय करेंगे
ये किस सहीफ़े की कौन सी आयतें पढ़ेंगी
ये कौन होती हैं
अपनी मर्ज़ी का रंग पहनें
स्कूल जाएँ हमें पढ़ाएँ
हमें बताएँ
कि इन का रब भी वही है जिस ने हमें बनाया
बराबरी के सबक़ सिखाएँ
ये लौंडियाँ हैं ये जूतियाँ हैं
ये कौन होती हैं अपनी मर्ज़ी से जीने वाली
बताने वाले हमें यही तो बता गए हैं
जो हुक्मरानों की बात टालें
जो अपने भाई से हिस्सा माँगे
जो शौहरों को ख़ुदा न समझें
जो क़द्रे मुश्किल सवाल पूछें
जो अपनी मेहनत का बदला माँगे
जो आजिरों से ज़बाँ लड़ाएँ
जो अपने जिस्मों पे हक़ जताएँ
वो बे-हया हैं

— Shoaib Kiani

More by Shoaib Kiani

Other nazm from the same pen

See all from Shoaib Kiani →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling