तुझे लिख्खूंगा इस तरह से मैं अपनी कहानी में

हो उम्दा क़ाफिया जैसे कोई मिसरा-ए-सानी में

बहुत ग़लती हुई हैं. भूल से मुझ से जवानी में
मगर अफ़सोस तो होगा न मुझ को जिंदगानी में

निकलना नाव को ले कर है अब गहरे समुंदर में
ज़रा हम देख लें कितनी बची है आग पानी में

भला किस ने कहा तुम से कि गुल खिलते नहीं शब में
कभी डालो ज़रा तुम चांदनी को रातरानी में

ख़ुदा इस से ज़ियादा भी मुहब्बत क्या मुक़म्मल हो
ज़नाज़े में लेटा है प्यार मेरा शेरवानी में

— Shubham Seth

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