सड़क सूनी बहुत है और उस पर हम अकेले

नहीं हैं ग़म भले चलना पड़ा हर दम अकेले

कभी बारिश, कभी आंधी, कभी फिर धूप सर पे
निकल जाएँगे तुम बिन अब सभी मौसम अकेले

तुझे तो सामने से ख़ुश लगेगा वो परिंदा
मनाता है मगर वो क़ैद का मातम अकेले

अकेलापन हमें खा जाएगा मालूम तो था
तुझे देखे बिना फिर भी मरेंगे कम अकेले

नमक सस्ता बहुत है उस से ज़्यादा लोग सस्ते
लगाता हूँ मैं अक्सर घाव पर मरहम अकेले

ग़लत-फ़हमी हुई होगी तुझे ये सच नहीं है
तुझे किस ने कहा मुझ को बहुत हैं ग़म अकेले

— Shubham Seth

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