बिखरते हैं सिमटते हैं मेरे हालात और फिर मैं
अधूरी ही रही उस रात भी हर बात और फिर मैं
वहाँ इक हादसे को देख अनदेखा किया सबने
लिहाज़ा मर गए थे सब बची हर बात और फिर मैं
बड़ा बैचेन था ये मन किसी के पास जाने को
मशक़्क़त से वहाँ से लौटे कुछ जज़्बात और फिर मैं
कभी साया कोई ऐसे लिपटता है बदन से फिर
बड़े नासूर होते हैं तभी हालात और फिर मैं
— Shubhangi Bharti















