देखने से जो लगे जादूगरी है
फूल से हाथों की ये कारीगरी है
मौत ने मुझ को रिहा कब से किया है
ज़िंदगी के हाथ मेरी हथकड़ी है
रंजिशों के धुन सुनाई दे रहे हैं
अब ग़मों के हाथ मेरी बांसुरी है
वक़्त का अंदाज़ मुझ को है नहीं पर
यार मेरे पास वैसे दो घड़ी है
शान रुत्बा घर विरासत में मिला है
और उस पे ग़म कि उस को नौकरी है
शौक़ से कर लो मेरे घर में तलाशी
घर में बस इक क़ीमती सी डाइरी है
— Shubhangi Bharti















