अपना सा है ये लग रहा कोई
मेरी आँखों में हादसा कोई
अब मेरे पास मेरा कुछ भी नहीं
जाँ थी इक वो भी ले गया कोई
देख ये ज़ख़्मों से भरे हुए हाथ
कभी इनको था चूमता कोई
सज़ा भी हम को रात की ही हुई
चैन से कैसे काटता कोई
कही रख कर मैं ख़ुद को भूल गया
मुझ को फिर कैसे ढूँढ़ता कोई
— Simar Gozra















