जैसे ख़ुद ही पेड़ गिरा हो आरे परहम से क़ाबू हुआ न अपने ग़ुस्से परमैं हूँ जो हूँ ख़ाली पड़ा हूँ कमरे मेंबर्तन हैं जो ख़ाली पड़े हैं चूल्हे पर— Simar Gozra