kahi qaaleen raahon mein biche hain | कहीं क़ालीन राहों में बिछे हैं

  - Siraj Faisal Khan

कहीं क़ालीन राहों में बिछे हैं
कहीं पैरों में चप्पल भी नहीं है

  - Siraj Faisal Khan

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    उस के दिल की आग ठंडी पड़ गई
    मुझ को शोहरत मिल गई इल्ज़ाम से
    Siraj Faisal Khan
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    बेसाख़्ता शमशीर पलट म्यान में आई
    गुलदस्ते लिए फ़ौज वो मैदान में आई

    इल्हाम उतरता है पयम्बर पे किसी ज्यूँ
    चाहत तेरी ऐसे दिले वीरान में आई

    कुछ राज़ सिवा रब के नहीं जानता कोई
    हर बात नहीं खुल के है क़ुरआन में आई

    गलियों से गुज़रते हुए चौंक उठता हूँ अक्सर
    जैसे तेरी आवाज़ मेरे कान में आई

    अब जा के कहीं ऑन हुआ फ़ोन किसी का
    अब जा के कहीं जान मेरी जान में आई

    लहजा हुआ तुलसी का मेरे खुरदरा कैसे
    तल्ख़ी ये भला क्यूँ मेरे रसखान में आई

    नाक़िद तू कहेगा मुझे शागिर्द बना लें
    ये शाइरी जिस दिन तेरे संज्ञान में आई
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    Siraj Faisal Khan
    आज मेरी इक ग़ज़ल ने उस के होंटों को छुआ
    आज पहली बार अपनी शाइरी अच्छी लगी
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    ख़याल कब से छुपा के ये मन में रक्खा है
    मिरा क़रार तुम्हारे बदन में रक्खा है
    Siraj Faisal Khan
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    तुम उस को बुलंदी से गिराने में लगे हो
    तुम उस को निगाहों से गिरा क्यूँ नहीं देते
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