ग़म को हम यूँँ भी आज़माते हैंहिज्र में उस के जगमगाते हैंचाँदनी रात मुझ से कहती हैख़ुद को इतना नहीं सताते हैंहम ने चाहा तुम्हें नहीं चाहेक्या करें ख़्वाब टूट जाते हैंशौक़ था बस अकेले चलने काअब सर-ए-राह लड़खड़ाते हैंइस लिए फ़ासला रखा तुम सेचूमने वाले छोड़ जाते हैं— Sristi Singh