सभी के दिलों में कसक सी उठी है

कि क्यूँ आँख उस की चमक सी उठी है

कोई खिड़कियाँ खटखटा कर गया है
मिरी चूड़ियों में खनक सी उठी है

वही इश्क़ फिर शोर क्यूँ कर रहा है
बुझी आग फिर क्यूँ दहक सी उठी है

तिरे लम्स का है अभी तक असर जाँ
बदन से मिरे कुछ महक सी उठी है

— Sristi Singh

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