अगर बे-वफ़ा वो सितमगर न होता
मोहब्बत का इल्ज़ाम मुझ पर न होता
हवा मेरे अपनों ने दी थी नहीं तो
जलाया किसी ने मिरा घर न होता
नहीं सीखता उठ खड़ा होना गिरकर
लगा पाँव में गर वो पत्थर न होता
तुम्हें नाज़ है हुस्न पर तो सुनो तुम
मुझे भी जुदाई का अब डर न होता
— Shashank Shekhar Pathak















