dard ke daaimi rishton se lipt jaate hain | दर्द के दाइमी रिश्तों से लिपट जाते हैं

  - Subhan Asad

दर्द के दाइमी रिश्तों से लिपट जाते हैं
अक्स रोते हैं तो शीशों से लिपट जाते हैं

हाए वो लोग जिन्हें हम ने भुला रक्खा है
याद आते हैं तो साँसों से लिपट जाते हैं

किस के पैरों के निशाँ हैं कि मुसाफ़िर भी अब
मंज़िलें भूल के रस्तों से लिपट जाते हैं

जब वह रोता है तो यक-लख़्त मिरी प्यास के होंट
उस की आँखों के किनारों से लिपट जाते हैं

जब उन्हें नींद पनाहें नहीं देती हैं 'असद'
ख़्वाब फिर जागती आँखों से लिपट जाते हैं

  - Subhan Asad

Bekhabri Shayari

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