rishton ki ye naazuk dore todi thodi jaati hain | रिश्तों की ये नाज़ुक डोरें तोड़ी थोड़ी जाती हैं,

  - Subhan Asad

रिश्तों की ये नाज़ुक डोरें तोड़ी थोड़ी जाती हैं,
अपनी आँखे दुखती हों तो फोड़ी थोड़ी जाती हैं

ये कांटे, ये धूप, ये पत्थर इनसे कैसा डरना है
राहें मुश्किल हो जाएँ तो छोड़ी थोड़ी जाती हैं

  - Subhan Asad

Ujaala Shayari

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