मैं यूँँ तो ख़्वाब की ता'बीर सोचता भी नहीं

मगर वो शख़्स मिरे रत-जगों का था भी नहीं

मेरा नसीब वो समझा न बात इशारों की
मेरा मिज़ाज कि मैं साफ़ कह सका भी नहीं

बड़ी गिराँ है मेरी जाँ ये कैफ़ियत मत पूछ
कि इन लबों पे गिला भी नहीं दुआ भी नहीं

ये ज़िंदगी के तआक़ुब में रोज़ का फिरना
अगरचे इस तरह जीने का हौसला भी नहीं

ये बे-नियाज़ तबीअत ये बे-ख़ुदी के रंग
हम अपने आप से ख़ुश भी नहीं ख़फ़ा भी नहीं

उस एक शक्ल को जिस दिन से खो दिया है 'असद'
मिरे दरीचे से अब चाँद झाँकता भी नहीं

— Subhan Asad

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