मेरे रुख़सार से जुल्फ़ों को वो जब जब हटाता है

वो कहता है नज़र उस को मह-ए-ख़ुर्शीद आता है

लगा कर कान के पीछे मेरी आँखों का ही काजल
ज़माने की बुरी नज़रों से मुझ को यूँ बचाता है

मुहब्बत मुद्दतों के बा'द बिखरी है हथेली पर
हिना का रंग उस के इश्क़ की हद को बताता है

मैं हूँ इस सोच में हरदम कभी होगा मुकम्मल क्या
सुना है इश्क़ सच्चा हो तो कामिल हो न पाता है

सुनो तूफ़ाँ से दावानल को क्या बुझते कभी देखा
वही दीपक हवा का एक झोंका सह न पाता है

यही कहते हुए जब भी वो सर पर हाथ रखता है
मेरे अंदर का डर पल भर में जैसे खो ही जाता है

क़ज़ा आई थी कल मिलने उसे ये कह के रोका है
जनाज़ा एक लड़की का पिया के घर से जाता है

— Dr Bhagyashree Joshi

More by Dr Bhagyashree Joshi

Other ghazal from the same pen

See all from Dr Bhagyashree Joshi →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling