लुटे दिल का लुटेरे को ही क्यूँँ सुलतान कर डाला
तुम्हारी ज़द में आ कर के बड़ा नुक़सान कर डाला
तुम्हारी बे-घरी में दिल तुम्हें रहने को दे कर के
ख़ुदी को ख़ुद के दिल का आज यूँ मेहमान कर डाला
गुलाब-ए-सुर्ख़ होंठों से छुआ जो जिस्म को उस ने
लगा पल भर में रेगिस्तान को गुलदान कर डाला
सुना है चाँद रात उस के फ़क़त आ जाने से छत पे
कई दीवानियों ने ईद का ऐलान कर डाला
ख़सारा आख़िरी मेरा मोहब्बत पहली हो जानाँ
तुम्हारे बा'द दिल को मैं ने रेगिस्तान कर डाला
— Dr Bhagyashree Joshi















