क्यूँ तेरे दर से ही चुप चाप गुज़र आते हैं
जो ख़ुदाओं की तरह बन के शरर आते हैं
वो मेरा हो के भी हो सकता नहीं हैरत है
फिर भी हर हाल में हम साथ नज़र आते हैं
वक़्त है दोस्त इसे ध्यान में रख काम में ला
ख़्वाब वीरान जज़ीरों पे उतर आते हैं
उसके वहदत ने मुझे अपनी तरफ़ खींचा था
वरना रस्ते में तो कितने ही शजर आते हैं
हर कोई चाँद सा चेहरा नहीं होता सच्चा
आबशारों की तहों में भी खंडर आते हैं
मैं कि हैरान हूँ इस रब्त पे हम दोनों के
ले के हर बार अदू तेरी ख़बर आते हैं
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