RAAHI
RAAHI
Ghazal

मिले उस को ज़रा दिल तोड़ने वाला बराबर है

अकेली वो नहीं दुनिया कि इकलौती सितमगर है

मुकर्रर हो रही है शा'इरी बस नाम से तेरे
ज़माने को नहीं मालूम कितना दर्द अंदर है

अदब वाले बचे इस शहर में अब कौन है बोलो
यहाँ हर शख़्स के भीतर छिपा अपना समुंदर है

ज़रा सी इक झलक पा के फ़क़त शीशे में खिलजी ने
कहा पद्मावती नायाब अलबेली सी सुंदर है

किसी को याद कर के पन्ने भरता आजकल राही
सुना चर्चा है महफ़िल में बड़ा अच्छा सुखन-वर है

— RAAHI

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