मिले उसको ज़रा दिल तोड़ने वाला बराबर है
अकेली वो नहीं दुनिया कि इकलौती सितमगर है
मुकर्रर हो रही है शायरी बस नाम से तेरे
ज़माने को नहीं मालूम कितना दर्द अंदर है
अदब वाले बचे इस शहर में अब कौन है बोलो
यहाँ हर शख़्स के भीतर छिपा अपना समंदर है
ज़रा सी इक झलक पा के फ़क़त शीशे में खिलजी ने
कहा पद्मावती नायाब अलबेली सी सुन्दर है
किसी को याद कर के पन्ने भरता आजकल राही
सुना चर्चा है महफ़िल में बड़ा अच्छा सुखन-वर है
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