हमारी याद से उन की बग़ावत तक नहीं होती
मोहब्बत की है जब से तो शिकायत तक नहीं होती
अगर आते न उस दिन वो लगा कर के अलग काजल
हमारे दिल-नज़र से यूँ शरारत तक नहीं होती
मेरे कमरे में जानाँ देख सब बिखरा पड़ा है अब
तेरे जाने पे मुझ से तो हिफ़ाज़त तक नहीं होती
हमारा दिल किसी लड़की पे अब लगता कहाँ दिलबर
मुहब्बत के जो मारे है मुहब्बत तक नहीं होती
मगर वादे वफ़ा के तुम सभी आशिक़ से करते हो
अगर तुम सा ही होता तो मुसीबत तक नहीं होती
बहुत ज़्यादा तजुर्बा है तुझे आशिक़ बदलने का
अगर मिलते न मुझ को तो ये ग़फ़लत तक नहीं होती
बदलते हम अगर तेरी तरह हर दिन नया बिस्तर
बदलते दर्द से राही को दिक़्क़त तक नहीं होती















