"लड़को का जीवन"बेहतर ज़िंदगी को बदतर बनाने के लिएलड़को की ज़िंदगी होती है आज़माने के लिएदिल टूट गया तो टूटा ही रहने दें आपहम को तो इजाज़त भी नहीं मय-ख़ाने के लिएग़मों को लादे यूँ पीठ पर चल रहा हूँ मैंमुड़कर पीछे देखना पड़ता है ज़हर खाने के लिए— Abhishek Bharat Upadhyay