इस रात की तारीकी पर कुछ तो असर आए
चेहरे से हटा जुल्फ़ें के चाँद नज़र आए
ख़त आपको लिख लिख कर उक्ता से गए हम भी
अब आप की जानिब से कोई तो ख़बर आए
मंज़िल न ठिकाना हो और साथ तुम्हरा हो
ए काश के किस्मत में एसा भी सफ़र आए।
दुनिया के खराबे में ख़्वाबों को जला कर के
जब कुछ न हुआ हासिल हम लौट के घर आए
मिट्टी की महक से ही पहचान मैं लेता हूँ
जब ट्रेन से लौटूँ और अपना ये शहर आए
उस शख़्स के लहजे में तासीर है इतनी के
बोले तो समंदर से गौहर भी उभर आए
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