"गुफ़्त-ओ-गू"
मेरे वतन तू प्यारे मिरे मुल्क-ए-मोतबर
हालत पे आज अपनी ज़रा डाल इक नज़र
क्या मिल सका है उन के लहू का सिला उन्हे
तेरे लिए कफ़न में जो लौटे थे अपने घर
अज़्मत को अपनी भूल रहा है तू ऐ वतन
मेरे लबों से सुन ले ये किस्सा-ए-मुख़्तसर
चाहे हो फ़लसफ़ा या रियाज़ी की बात हो
तू ने ही तो जहाँ को सिखाए थे ये हुनर
शतरंज किस की देन है दुनिया को कौन था
तू ही तो था जहान की इक शम-ए-रहगुज़र
क्यूँ भूलता है अपनी तू अज़्मत की दास्ताँ
मेरे लबों से सुन ले ये किस्सा-ए-मुख़्तसर
जब गुम हुआ वजूद सियह रात में तिरा
कुर्बाँ हुए थे चाँद कई तब हुई सहर
सींची गई लहू से ज़मीं गुल्सिताँ की जब
तब जा के गुल खिले थे कई रंग के इधर
बोया गया था जो कभी इन्सानियत का बीज
क़ायम है उस के दम से ज़माने में इक शजर
आज़ाद हो गए हैं सभी जिस्म क़ैद से
क्यूँ सोच सब की आज भी है क़ैद में मगर
हम भी शजर थे एक इसी गुल्सिताँ के और
कुर्बान हम ने कर दिए तुझ पे सभी समर
इल्ज़ाम फिर भी है कि वफ़ादार हम नहीं
मज़हब के हैं वतन के अलम-दार हम नहीं
मिट्टी से तेरी हम को है उल्फ़त कुछ इस क़दर
सजदा ख़ुदा का करते हैं इस पर लगा के सर
मज़हब है अव्वलीन तो मज़हब की बात सुन
मज़हब ये कह रहा है वफ़ाएँ वतन से कर
मेरे वतन अमीन मिरे मेरे हम-नज़र
नज़रों में मेरी अब भी है तू एक ताजवर
तुझ से लिया है हम ने ये पैमान ऐ वतन
कुर्बाँ हमारी तुझ पे है मुस्कान ऐ वतन
कुर्बाँ हमारे तुझ पे दिल-ओ-जान ऐ वतन
कुर्बाँ हैं आज कल भी हैं कुर्बान ऐ वतन
कुर्बाँ हमारे तुझ पे सब अरमान ऐ वतन
है आन-बान शान भी कुर्बान ऐ वतन















