शा'इरी रूह की है इबादत

इस इबादत से मुझ को मुहब्बत

भूल जाता है बच्चा भला क्यूँ
वो है माँ बाप की एक दौलत

आम से हर ग़ज़ल ख़ास हो ये
बस यही दिल में है एक हसरत

ढूँढ़ता जो फिरे हम-क़वाफ़ी
शा'इरी पर है वो शख़्स तोहमत

है अलिफ़ वस्ल सी छूट इस
में
शा'इरी में बड़ी है इज़ाफ़त

अब यही बस मुझे तुम से कहना
है मुझे शा'इरी से मुहब्बत

छूट जाए न 'सलमा' क़लम ये
बस यही एक डर है क़यामत

— Salma Malik

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