“मेरी बहन”
मुझ से चाहे जितना मेरी बहन झगड़ती है
पर मेरी ख़ुशियों की ख़ातिर सब से लड़ती है
इक दूजे से गर नाराज़ कभी हो जाएँ भी
मुझ को राज़ी करने आएगी फिर भी वो ही
ये रिश्ता खट्टी मीठी यादों का होता है
चोट मुझे लग जाए दर्द उसे भी होता है
अपनी सारी ज़िम्मेदारी ख़ूब निभाए वो
छोटी होकर भी तो बहन बड़ी बन जाए वो
चाय बना कर देती है वो जब मैं कहती हूँ
मैं बातों-बातों में उस से लड़ती रहती हूँ
एक सदा है बस उस की बहना की उस रब से
रब्बा उस को जीवन साथी सब से बेहतर दे
उस की ही ख़ातिर मैं ने ये नज़्म लिखी है तो
उस से कहना वो भी पढ़ ले मेरी नज़्मों को















