chaman mein rakhte hain kaante bhi ik maqaam ai dost | चमन में रखते हैं काँटे भी इक मक़ाम ऐ दोस्त

  - Ummeed Fazli

चमन में रखते हैं काँटे भी इक मक़ाम ऐ दोस्त
फ़क़त गुलों से ही गुलशन की आबरू तो नहीं

  - Ummeed Fazli

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    हाए इक शख़्स जिसे हम ने भुलाया भी नहीं
    याद आने की तरह याद वो आया भी नहीं

    जाने किस मोड़ पे ले आई हमें तेरी तलब
    सर पे सूरज भी नहीं राह में साया भी नहीं

    वज्ह-ए-रुस्वाई-ए-एहसास हुआ है क्या क्या
    हाए वो लफ़्ज़ जो लब तक मिरे आया भी नहीं

    ऐ मोहब्बत ये सितम क्या कि जुदा हूँ ख़ुद से
    कोई ऐसा मिरे नज़दीक तो आया भी नहीं

    या हमें ज़ुल्फ़ के साए ही में नींद आती थी
    या मयस्सर किसी दीवार का साया भी नहीं

    बार-हा दिल तिरी क़ुर्बत से धड़क उट्ठा है
    गो अभी वक़्त मोहब्बत में वो आया भी नहीं

    आप उस शख़्स को क्या कहिए कि जिस ने 'उम्मीद'
    ग़म दिया ग़म को दिल-आज़ार बनाया भी नहीं
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    Ummeed Fazli
    तुम हो जो कुछ कहाँ छुपाओगे
    लिखने वालो नज़र तो आओगे

    जब किसी को क़रीब पाओगे
    ज़ाइक़ा अपना भूल जाओगे

    आइना हैरतों का ख़्वाब नहीं
    ख़ुद से आगे भी ख़ुद को पाओगे

    ये हरारत लहू में कै दिन की
    ख़ुद-ब-ख़ुद उस को भूल जाओगे

    आँधियाँ रोज़ मुझ से पूछती हैं
    घर में किस दिन दिया जलाओगे

    साया रोके हुए है राह सफ़र
    तुम ये दीवार कब गिराओगे

    अब जो आए भी तुम तो क्या होगा
    ख़ुद दिखोगे मुझे दिखाओगे

    यही होगा कि तुम दर-ए-जाँ पर
    दस्तकें दे के लौट जाओगे

    वो जो इक शख़्स मुझ में ज़िंदा था
    उस को ज़िंदा कहाँ से लाओगे

    ऐसे मौसम गुज़र गए हैं कि अब
    मुझ को भी मुझ सा तुम न पाओगे

    जो लहू में दिए जलाती थीं
    ऐसी शामें कहाँ से लाओगे

    ख़्वाहिशों के हिसार में घिर कर
    रास्ता घर का भूल जाओगे
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    Ummeed Fazli
    हिजाब उट्ठे हैं लेकिन वो रू-ब-रू तो नहीं
    शरीक-ए-इश्क़ कहीं कोई आरज़ू तो नहीं

    ये ख़ुद-फ़रेबी-ए-एहसास-ए-आरज़ू तो नहीं
    तिरी तलाश कहीं अपनी जुस्तुजू तो नहीं

    सुकूत वो भी मुसलसल सुकूत क्या मअनी
    कहीं यही तिरा अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू तो नहीं

    उन्हें भी कर दिया बेताब-ए-आरज़ू किस ने
    मिरी निगाह-ए-मोहब्बत कहीं ये तू तो नहीं

    कहाँ ये इश्क़ का आलम कहाँ वो हुस्न-ए-तमाम
    ये सोचता हूँ कि मैं अपने रू-ब-रू तो नहीं

    निगाह-ए-शौक़ से ग़ाफ़िल समझ न जल्वों को
    शराब कुछ भी हो बे-गाना-ए-सुबू तो नहीं

    ख़ुशी से तर्क-ए-मोहब्बत का अहद ले ऐ दोस्त
    मगर ये देख तिरा दिल लहू लहू तो नहीं

    न गर्द-ए-राह है रुख़ पर न आँख में आँसू
    ये जुस्तुजू भी सही उस की जुस्तुजू तो नहीं

    चमन में रखते हैं काँटे भी इक मक़ाम ऐ दोस्त
    फ़क़त गुलों से ही गुलशन की आबरू तो नहीं
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    Ummeed Fazli
    जाने ये कैसा ज़हर दिलों में उतर गया
    परछाईं ज़िंदा रह गई इंसान मर गया

    बर्बादियाँ तो मेरा मुक़द्दर ही थीं मगर
    चेहरों से दोस्तों के मुलम्मा उतर गया

    ऐ दोपहर की धूप बता क्या जवाब दूँ
    दीवार पूछती है कि साया किधर गया

    इस शहर में फ़राश-तलब है हर एक राह
    वो ख़ुश-नसीब था जो सलीक़े से मर गया

    क्या क्या न उस को ज़ोम-ए-मसीहाई था 'उमीद'
    हम ने दिखाए ज़ख़्म तो चेहरा उतर गया
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    Ummeed Fazli
    नाज़ कर नाज़ कि ये नाज़ जुदा है सब से
    मेरा लहजा मिरी आवाज़ जुदा है सब से

    जुज़ मोहब्बत किसे मालूम कि वो चश्म-ए-हया
    बात तो करती है अंदाज़ जुदा है सब से

    जिस को भी मार दिया ज़िंदा-ए-जावेद किया
    हर्फ़-ए-हक़ तेरा ये ए'जाज़ जुदा है सब से

    देखना कौन है क्या उस को नहीं जान-ए-अज़ीज़
    सर-ए-दरबार इक आवाज़ जुदा है सब से

    टूट जाता है तो सुर और भी लौ देते हैं
    दिल जिसे कहते हैं वो साज़ जुदा है सब से

    सोच कर दाम बिछाना ज़रा ऐ मौज-ए-हवा
    मेरे इंकार की परवाज़ जुदा है सब से

    नश्शा-ए-दहर-ओ-क़यामत का तो क्या ज़िक्र 'उमीद'
    वो मिरा सर्व-ए-सर-अफ़राज़ जुदा है सब से
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    Ummeed Fazli

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