Ummeed Fazli

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Ummeed Fazli shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ummeed Fazli's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

कल उस की आँख ने क्या ज़िंदा गुफ़्तुगू की थी गुमान तक न हुआ वो बिछड़ने वाला है — Ummeed Fazli
आसमानों से फ़रिश्ते जो उतारे जाएँ वो भी इस दौर में सच बोलें तो मारे जाएँ — Ummeed Fazli
ये सर्द रात ये आवारगी ये नींद का बोझ हम अपने शहर में होते तो घर चले जाते — Ummeed Fazli
जाने किस मोड़ पे ले आई हमें तेरी तलब सर पे सूरज भी नहीं राह में साया भी नहीं — Ummeed Fazli
चमन में रखते हैं काँटे भी इक मक़ाम ऐ दोस्त फ़क़त गुलों से ही गुलशन की आबरू तो नहीं — Ummeed Fazli

Ghazal

आईना-ए-वहशत को जिला जिस से मिली है वो गर्द रह-ए-तर्क-ए-मरासिम से उठी है सदियों के तसलसुल में कहीं गर्दिश-ए-दौराँ पहले भी कहीं तुझ से मुलाक़ात हुई है ऐ कर्ब-ओ-बला ख़ुश हो नई नस्ल ने अब के ख़ुद अपने लहू से तिरी तारीख़ लिखी है उस कज-कुलह-ए-इश्क़ को ऐ मश्क़-ए-सितम देख सर तन पे नहीं फिर भी वही सर्व-क़दी है किस राह से तुझ तक हो रसाई कि हर इक सम्त दुनिया किसी दीवार के मानिंद खड़ी है ज़िंदाँ की फ़सीलें हों कि मक़्तल की फ़ज़ाएँ रफ़्तार-ए-जुनूँ भी कहीं रोके से रुकी है जिस रूप में जब चाहे जिसे ढाल दे 'उम्मीद' दुनिया भी अजब कार-गह-ए-कूज़ा-गरी है — Ummeed Fazli
अक़्ल ने हम को यूँँ भटकाया रह न सके दीवाने भी आबादी को ढूँडने निकले खो बैठे वीराने भी चश्म-ए-साक़ी भी नम है लौ देते हैं पैमाने भी तिश्ना-लबी के सैल-ए-तपाँ से बच न सके मयख़ाने भी संग-ए-जफ़ा को ख़ुश-ख़बरी दो मुज़्दा दो ज़ंजीरों को शहर-ए-ख़िरद में आ पहुँचे हैं हम जैसे दीवाने भी हम ने जब जिस दोस्त को भी आईना दिखाया माज़ी का हैराँ हो कर अक्स ने पूछा आप मुझे पहचाने भी जिस्म की तिश्ना-सामानी से जिस्म ही ना-आसूदा नहीं टूट गए इस ज़द पर आ कर रूह के ताने-बाने भी अंदेशे और बज़्म-ए-जानाँ दार का ज़िक्र और इतना सुकूत दीवानों के भेस में शायद आ पहुँचे फ़रज़ाने भी — Ummeed Fazli
हम तिरा अहद-ए-मोहब्बत ठहरे लौह-ए-निस्याँ की जसारत ठहरे दिल लहू कर के ये क़िस्मत ठहरे संग फ़नकार की उजरत ठहरे मक़्तल-ए-जाँ की ज़रूरत ठहरे हम कि शायान-ए-मोहब्बत ठहरे क्या क़यामत है वो क़ातिल मुझ में मेरे एहसास की सूरत ठहरे वक़्त के दजला-ए-तूफ़ानी में आप हम मौजा-ए-उज्लत ठहरे दोस्ती ये है कि ख़ुश्बू के लिए रंग ज़िंदानी-ए-सूरत ठहरे तू है ख़ुर्शीद न मैं हूँ शबनम क्या मुलाक़ात की सूरत ठहरे उफ़ ये गुज़रे हुए लम्हों का हुजूम दर-ओ-दीवार क़यामत ठहरे कूचा-गर्दान-ए-जुनूँ मिस्ल-ए-सबा ज़ुल्फ़-ए-आवारा की क़िस्मत ठहरे इश्क़ में मंज़िल आराम भी थी हम सर-ए-कूचा-ए-वहशत ठहरे जब से 'उम्मीद' गया है कोई!! लम्हे सदियों की अलामत ठहरे — Ummeed Fazli
इक ऐसा मरहला-ए-रह-गुज़र भी आता है कोई फ़सील-ए-अना से उतर भी आता है तिरी तलाश में जाने कहाँ भटक जाऊँ सफ़र में दश्त भी आता है घर भी आता है तलाश साए की लाई जो दश्त से तो खुला अज़ाब-ए-सूरत-ए-दीवार-ओ-दर भी आता है सकूँ तो जब हो कि मैं छाँव सेहन में देखूँ नज़र तो वैसे गली का शजर भी आता है बदन की ख़ाक समेटे हुए हो क्या लोगों सफ़र में लम्हा-ए-तर्क-ए-सफ़र भी आता है दिलों को ज़ख़्म न दो हर्फ़-ए-ना-मुलाएम से ये तीर वो है कि जो लौट कर भी आता है मैं शहर में किसे इल्ज़ाम-ए-ना-शनासी दूँ ये हर्फ़ ख़ुद मिरे किरदार पर भी आता है नज़र ये किस से मिली ना-गहाँ कि याद आया इसी गली में कहीं मेरा घर भी आता है हवा के रुख़ पे नज़र ताइरान-ए-ख़ुश-परवाज़ क़फ़स का साया पस-ए-बाल-ओ-पर भी आता है मैं हर्फ़ हर्फ़ में उतरा हूँ रौशनी की तरह सो काएनात का चेहरा नज़र भी आता है लहू से हर्फ़ तराशें जो मेरी तरह उम्मीद उन्हीं के हिस्से में ज़ख़्म-ए-हुनर भी आता है — Ummeed Fazli
हिजाब उट्ठे हैं लेकिन वो रू-ब-रू तो नहीं शरीक-ए-इश्क़ कहीं कोई आरज़ू तो नहीं ये ख़ुद-फ़रेबी-ए-एहसास-ए-आरज़ू तो नहीं तिरी तलाश कहीं अपनी जुस्तुजू तो नहीं सुकूत वो भी मुसलसल सुकूत क्या मअ'नी कहीं यही तिरा अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू तो नहीं उन्हें भी कर दिया बेताब-ए-आरज़ू किस ने मिरी निगाह-ए-मोहब्बत कहीं ये तू तो नहीं कहाँ ये इश्क़ का आलम कहाँ वो हुस्न-ए-तमाम ये सोचता हूँ कि मैं अपने रू-ब-रू तो नहीं निगाह-ए-शौक़ से ग़ाफ़िल समझ न जल्वों को शराब कुछ भी हो बे-गाना-ए-सुबू तो नहीं ख़ुशी से तर्क-ए-मोहब्बत का अहद ले ऐ दोस्त मगर ये देख तिरा दिल लहू लहू तो नहीं न गर्द-ए-राह है रुख़ पर न आँख में आँसू ये जुस्तुजू भी सही उस की जुस्तुजू तो नहीं चमन में रखते हैं काँटे भी इक मक़ाम ऐ दोस्त फ़क़त गुलों से ही गुलशन की आबरू तो नहीं — Ummeed Fazli
किसी से और तो क्या गुफ़्तुगू करें दिल की कि रात सुन न सके हम भी धड़कनें दिल की मगर ये बात ख़िरद की समझ में आ न सकी विसाल-ओ-हिज्र से आगे हैं मंज़िलें दिल की जिलौ में ख़्वाब-नुमा रत-जगे सजाए हुए कहाँ कहाँ लिए फिरती हैं वहशतें दिल की निगाह मिलते ही रंग-ए-हया की सूरत हैं छलक उठीं तिरे रुख़ से लताफ़तें दिल की निगाह-ए-कम भी उसे संग से ज़ियादा है कि आइने से सिवा हैं नज़ाकतें दिल की दयार-ए-हर्फ़-ओ-नवा में कोई तो ऐसा हो कभी किसी से तो हम बात कर सकें दिल की सर-ए-जरीदा-ए-हस्ती हमारे बा'द 'उमीद' लहू से कौन लिखेगा इबारतें दिल की — Ummeed Fazli
तुम हो जो कुछ कहाँ छुपाओगे लिखने वालो नज़र तो आओगे जब किसी को क़रीब पाओगे ज़ाइक़ा अपना भूल जाओगे आइना हैरतों का ख़्वाब नहीं ख़ुद से आगे भी ख़ुद को पाओगे ये हरारत लहू में कै दिन की ख़ुद-ब-ख़ुद उस को भूल जाओगे आँधियाँ रोज़ मुझ से पूछती हैं घर में किस दिन दिया जलाओगे साया रोके हुए है राह सफ़र तुम ये दीवार कब गिराओगे अब जो आए भी तुम तो क्या होगा ख़ुद दिखोगे मुझे दिखाओगे यही होगा कि तुम दर-ए-जाँ पर दस्तकें दे के लौट जाओगे वो जो इक शख़्स मुझ में ज़िंदा था उस को ज़िंदा कहाँ से लाओगे ऐसे मौसम गुज़र गए हैं कि अब मुझ को भी मुझ सा तुम न पाओगे जो लहू में दिए जलाती थीं ऐसी शा में कहाँ से लाओगे ख़्वाहिशों के हिसार में घिर कर रास्ता घर का भूल जाओगे — Ummeed Fazli
ऐ दिल-ए-ख़ुद-ना-शनास ऐसा भी क्या आईना और इस क़दर अंधा भी क्या उस को देखा भी मगर देखा भी क्या अर्सा-ए-ख़्वाहिश में इक लम्हा भी क्या दर्द का रिश्ता भी है तुझ से बहुत और फिर ये दर्द का रिश्ता भी किया ज़िंदगी ख़ुद लाख ज़हरों का थी ज़हर ज़हर-ए-ग़म तुझ से मिरा होता भी क्या पूछता है राह-रौ से ये सराब तिश्नगी का नाम है दरिया भी क्या खींचती है अक़्ल जब कोई हिसार धूप कहती है कि ये साया भी क्या उफ़ ये लौ देती हुई तन्हाइयाँ शहर में आबाद है सहरा भी क्या ख़ुद उसे दरकार थी मेरी नज़र ख़ुद-नुमा जल्वा मुझे देता भी क्या रक़्स करना हर नए झोंके के साथ बर्ग-ए-आवारा है ये दुनिया भी क्या ख़ंदा-ज़न ग़म पर ख़ुशी पर अश्क-बार इन दिनों यारो है रंग अपना भी क्या बे-तब-ओ-ताब-ए-शुआ-ए-आगही इश्क़ कहिए जिस को वो शो'ला भी क्या गाहे गाहे प्यार की भी इक नज़र हम से रूठे ही रहो ऐसा भी क्या ऐ मिरी तख़्लीक़-ए-फ़न तेरे बग़ैर मैं कि सब कुछ था मगर मैं था भी क्या नग़्मा-ए-जाँ को गिराँ-गोशों के पास ना-रसाई के सिवा मिलता भी क्या — Ummeed Fazli
वो ख़्वाब ही सही पेश-ए-नज़र तो अब भी है बिछड़ने वाला शरीक-ए-सफ़र तो अब भी है ज़बाँ बुरीदा सही मैं ख़िज़ाँ-गज़ीदा सही हरा-भरा मिरा ज़ख़्म-ए-हुनर तो अब भी है सुना था हम ने कि मौसम बदल गए हैं मगर ज़मीं से फ़ासला-ए-अब्र-ए-तर तो अब भी है हमारी दर-बदरी पर न जाइए कि हमें शुऊर-ए-साया-ए-दीवार-ओ-दर तो अब भी है हवस के दौर में मम्नून-ए-याद-ए-यार हैं हम कि याद-ए-यार दिलों की सिपर तो अब भी है कहानियाँ हैं अगर मो'तबर तो फिर इक शख़्स कहानियों की तरह मो'तबर तो अब भी है हज़ार खींच ले सूरज हिसार-ए-अब्र मगर किरन किरन पे गिरफ़्त-ए-नज़र तो अब भी है समुंदरों से ज़मीनों को ख़ौफ़ क्या कि उमीद नुमू-पज़ीर ज़मीन-ए-हुनर तो अब भी है मगर ये कौन बदलती हुई रुतों से कहे शजर में साया नहीं है शजर तो अब भी है — Ummeed Fazli
नाज़ कर नाज़ कि ये नाज़ जुदा है सब से मेरा लहजा मिरी आवाज़ जुदा है सब से जुज़ मोहब्बत किसे मालूम कि वो चश्म-ए-हया बात तो करती है अंदाज़ जुदा है सब से जिस को भी मार दिया ज़िंदा-ए-जावेद किया हर्फ़-ए-हक़ तेरा ये ए'जाज़ जुदा है सब से देखना कौन है क्या उस को नहीं जान-ए-अज़ीज़ सर-ए-दरबार इक आवाज़ जुदा है सब से टूट जाता है तो सुर और भी लौ देते हैं दिल जिसे कहते हैं वो साज़ जुदा है सब से सोच कर दाम बिछाना ज़रा ऐ मौज-ए-हवा मेरे इनकार की परवाज़ जुदा है सब से नश्शा-ए-दहर-ओ-क़यामत का तो क्या ज़िक्र 'उमीद' वो मिरा सर्व-ए-सर-अफ़राज़ जुदा है सब से — Ummeed Fazli
हाए इक शख़्स जिसे हम ने भुलाया भी नहीं याद आने की तरह याद वो आया भी नहीं जाने किस मोड़ पे ले आई हमें तेरी तलब सर पे सूरज भी नहीं राह में साया भी नहीं वज्ह-ए-रुस्वाई-ए-एहसास हुआ है क्या क्या हाए वो लफ़्ज़ जो लब तक मिरे आया भी नहीं ऐ मोहब्बत ये सितम क्या कि जुदा हूँ ख़ुद से कोई ऐसा मिरे नज़दीक तो आया भी नहीं या हमें ज़ुल्फ़ के साए ही में नींद आती थी या मुयस्सर किसी दीवार का साया भी नहीं बार-हा दिल तिरी क़ुर्बत से धड़क उट्ठा है गो अभी वक़्त मोहब्बत में वो आया भी नहीं आप उस शख़्स को क्या कहिए कि जिस ने 'उम्मीद' ग़म दिया ग़म को दिल-आज़ार बनाया भी नहीं — Ummeed Fazli