ik aisa marhala-e-rah-guzar bhi aata hai | इक ऐसा मरहला-ए-रह-गुज़र भी आता है

  - Ummeed Fazli

इक ऐसा मरहला-ए-रह-गुज़र भी आता है
कोई फ़सील-ए-अना से उतर भी आता है

तिरी तलाश में जाने कहाँ भटक जाऊँ
सफ़र में दश्त भी आता है घर भी आता है

तलाश साए की लाई जो दश्त से तो खुला
अज़ाब-ए-सूरत-ए-दीवार-ओ-दर भी आता है

सकूँ तो जब हो कि मैं छाँव सेहन में देखूँ
नज़र तो वैसे गली का शजर भी आता है

बदन की ख़ाक समेटे हुए हो क्या लोगों
सफ़र में लम्हा-ए-तर्क-ए-सफ़र भी आता है

दिलों को ज़ख़्म न दो हर्फ़-ए-ना-मुलाएम से
ये तीर वो है कि जो लौट कर भी आता है

मैं शहर में किसे इल्ज़ाम-ए-ना-शनासी दूँ
ये हर्फ़ ख़ुद मिरे किरदार पर भी आता है

नज़र ये किस से मिली ना-गहाँ कि याद आया
इसी गली में कहीं मेरा घर भी आता है

हवा के रुख़ पे नज़र ताइरान-ए-ख़ुश-परवाज़
क़फ़स का साया पस-ए-बाल-ओ-पर भी आता है

मैं हर्फ़ हर्फ़ में उतरा हूँ रौशनी की तरह
सो काएनात का चेहरा नज़र भी आता है

लहू से हर्फ़ तराशें जो मेरी तरह उम्मीद
उन्हीं के हिस्से में ज़ख़्म-ए-हुनर भी आता है

  - Ummeed Fazli

Shajar Shayari

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