naaz kar naaz ki ye naaz juda hai sab se | नाज़ कर नाज़ कि ये नाज़ जुदा है सब से

  - Ummeed Fazli

नाज़ कर नाज़ कि ये नाज़ जुदा है सब से
मेरा लहजा मिरी आवाज़ जुदा है सब से

जुज़ मोहब्बत किसे मालूम कि वो चश्म-ए-हया
बात तो करती है अंदाज़ जुदा है सब से

जिस को भी मार दिया ज़िंदा-ए-जावेद किया
हर्फ़-ए-हक़ तेरा ये ए'जाज़ जुदा है सब से

देखना कौन है क्या उस को नहीं जान-ए-अज़ीज़
सर-ए-दरबार इक आवाज़ जुदा है सब से

टूट जाता है तो सुर और भी लौ देते हैं
दिल जिसे कहते हैं वो साज़ जुदा है सब से

सोच कर दाम बिछाना ज़रा ऐ मौज-ए-हवा
मेरे इंकार की परवाज़ जुदा है सब से

नश्शा-ए-दहर-ओ-क़यामत का तो क्या ज़िक्र 'उमीद'
वो मिरा सर्व-ए-सर-अफ़राज़ जुदा है सब से

  - Ummeed Fazli

Andaaz Shayari

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