ज़ेहन-ओ-दिल में कुछ न कुछ रिश्ता भी था

ऐ मोहब्बत मैं कभी यकजा भी था

मुझ में इक मौसम कभी ऐसा न था
ऐसा मौसम जिस में तू महका भी था

तुझ से मिलने किस तरह हम आए हैं
रास्ते में ख़ून का दरिया भी था

कज-कुलाहों पर कहाँ मुमकिन सितम
हाँ मगर उस ने मुझे चाहा भी था

आज ख़ुद साया-तलब है वक़्त से
ये वही घर है कि जो साया भी था

जाने किस सहरा-ए-ग़म में खो गया
हाए वो आँसू कि जो दरिया भी था

— Ummeed Fazli

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Dariya Shayari

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