ye saal bhi udaasiyaan de kar chala gaya | ये साल भी उदासियाँ दे कर चला गया

  - Unknown

ये साल भी उदासियाँ दे कर चला गया
तुम से मिले बग़ैर दिसम्बर चला गया

  - Unknown

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As you were reading Shayari by Unknown

    ऐ आसमान तेरे ख़ुदा का नहीं है ख़ौफ़
    डरते हैं ऐ ज़मीन तेरे आदमी से हम
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    चल दिए घर से तो घर नहीं देखा करते
    जाने वाले कभी मुड़ कर नहीं देखा करते

    सीपियां कौन किनारे से उठा कर भागा
    ऐसी बाते समंदर नहीं देखा करते
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    Unknown
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    नतीजा फिर वही होगा सुना है साल बदलेगा
    परिंदे फिर वही होंगे शिकारी जाल बदलेगा

    वही हाकिम वही ग़ुर्बत वही क़ातिल वही ग़ासिब
    बताओ कितने सालों में हमारा हाल बदलेगा
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    Unknown
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    ख़ंजर-ए-शब जो उतर जाएँगे आँखों में मिरी
    मंज़र-ए-रफ़्ता ठहर जाएँगे आँखों में मिरी

    ज़ुल्म सहने के लिए रखता हूँ पत्थर का जिगर
    अश्क-ए-ग़म यूँही न भर जाएँगे आँखों में मिरी

    होगा बाज़ू से नुमायाँ मिरी जुरअत का कमाल
    हादसे जब भी ठहर जाएँगे आँखों में मिरी

    जब भी आएगा मुझे अहद-ए-गुज़िश्ता का ख़याल
    कितने तूफ़ाँ से बिफर जाएँगे आँखों में मिरी

    किस तरह ख़ुद में उतारेंगे सहर का नश्शा
    ज़ख़्म-ए-शब नींदें जो धर जाएँगे आँखों में मिरी
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    सादगी में भी क़यामत की अदा होती है
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