vo jiske paanv men rakhe hon kaainaat ke phool | वो जिसके पाँव में रक्खे हों काइनात के फूल

  - Varun Anand

वो जिसके पाँव में रक्खे हों काइनात के फूल
क़ुबूल कैसे करेगा वो मेरे हाथ के फूल

बनी भी उस की किसी से तो सिर्फ़ हम से ही
उसे पसंद भी आए तो काग़ज़ात के फूल

किसी का तोहफ़ा किसी और को दिया उसने
किसी को दे दिए उसने किसी के हाथ के फूल

लिए गए थे किसी सेज पर बिछाने को
जनाज़ा खा गया सारे सुहागरात के फूल

वो ख़ुश्बुओं का भी मज़हब निकाल लेता है
उसे ये लगता है होते हैं ज़ात पात के फूल

उदास लोगों को देते नहीं हैं फूल उदास
सहर में देना न उसको कभी भी रात के फूल

किसी ज़माने में महँगा नहीं था 'इश्क़ मियाँ
कि चाय ढाई की आती थी साढे सात के फूल

  - Varun Anand

Religion Shayari

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