वो जिस के पाँव में रक्खे हों काइनात के फूल
क़ुबूल कैसे करेगा वो मेरे हाथ के फूल
बनी भी उस की किसी से तो सिर्फ़ हम से ही
उसे पसंद भी आए तो काग़ज़ात के फूल
किसी का तोहफ़ा किसी और को दिया उस ने
किसी को दे दिए उस ने किसी के हाथ के फूल
लिए गए थे किसी सेज पर बिछाने को
जनाज़ा खा गया सारे सुहागरात के फूल
वो ख़ुश्बुओं का भी मज़हब निकाल लेता है
उसे ये लगता है होते हैं ज़ात पात के फूल
उदास लोगों को देते नहीं हैं फूल उदास
सहर में देना न उस को कभी भी रात के फूल
किसी ज़माने में महँगा नहीं था इश्क़ मियाँ
कि चाय ढाई की आती थी साढे सात के फूल















